जब बहे ठंडी पवन .. चांदनी रातों में
थरथरा उठे लहर .. झील के पानी में
चांद की परछाई .. क्यों मुझे याद आई
क्यों मुझे ऐसा लगे .. वक्त ले अंगडाई
सरसरे पत्ता सुखा .. खोया मन आहट में
थरथरा उठे लहर .. झील के पानी में
ना कोई खुशबू है .. फिर हवा क्यों है महकी
खुश्क में दूर तक ये .. क्यों नजर बहकी बहकी
झिलमिला जाती है क्यों .. मदहोशी सासों में
थरथरा उठे लहर .. झील के पानी में
घाव ना जख्म कही पे .. क्यों समा लगता घायल
कौनसा सगुन जान के .. ये समा भी है कायल
कौन ये दस्तक देने .. उतरा है धडकन में
थरथरा उठे लहर .. झील के पानी में
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