Sunday, 12 February 2017

बासरी


कालिंदीतटी कृष्ण मुरारी वाजवितो बासरी
आनंदाने उसळून येती कालिंदी लहरी

रवंथ करती गायी किनारी टवकारूनी कान
श्रवण करोनी होती सचेतन काळे पाषाण
गोप गोपिका शिल्प जाहले स्मृती भ्रंश होऊनी
कालिंदीतटी कृष्ण मुरारी वाजवितो बासरी

झाडावरचे स्तब्ध जाहले एक एक पान
पक्षी स्थिरावे फांदीवरती ऐकून मंजूळ तान
माथ्यावरचे मोरपीस मग डुलले मोहरूनी
कालिंदीतटी कृष्ण मुरारी वाजवितो बासरी

दाह रवीचाअलगद साहुनी नभ पांघरती दुलई
हरी दर्शना रवीकिरणांनी छेदियली निळई
क्षणभर बासरी वादन ऐकून किरण विरे चरणी
कालिंदीतटी कृष्ण मुरारी वाजवितो बासरी

अधर हरीचे हळूच चुंबिती बासरीचे ओठी
मधुर स्वरांची माळ उमटते बासरीचे पोटी
नादामधुनी कणा कणातून कृष्ण कृष्ण विस्तारी
कालिंदीतटी कृष्ण मुरारी वाजवितो बासरी



रात

क्यूँ मुसाफिर बन के रोज रात आती है।
जरा जरा सी ठहर के क्यूँ रात जाती है।।

दिन क्यूँ होते है .. लंबे लंबे .. साँस कहती है।
एक छोटेसे .. पल का कटना .. कितना मुश्किल है।
शाम की पहरेदारी .. सहना जादती .. हो जाती है।
जरा जरा सी ठहर के क्यूँ रात जाती है।।

चांद भी रूठके .. हर रोज .. तुकडा कम होता है।
एक दिन रूठके .. चेहरा भी .. छुपा देता है।
फिर कही एकही बार पूरी रात .. ठहर जाती है।
जरा जरा सी ठहर के क्यूँ रात जाती है।।

शिकायत भी करे .. तो भला .. किससे करे।
रुठ के और .. जल्दी जल्दी .. वो जाया न करे।
मिलन की प्यास भी .. अधुरीसी .. ही रह जाती है।
जरा जरा सी ठहर के क्यूँ रात जाती है।।



प्यारे ईश्वर

प्यारे ईश्वर,

होके मायूस तेरे दर से आज हम निकले
बेवफा तुम नही मगर बदनसीब हम निकले

तेरे दरस तरसे, घर से प्यासे हम निकले
तेरा दिदार न हुआ, बदनसीब हम निकले

कई दिवाने तेरे .. शामिल होने हम निकले
श्वापदो से परे रहे .. बदनसीब हम निकले

दिल के चोरी की शिकायत दर्ज करने हम निकले
दिल लगाया चोर से ही, बदनसीब हम निकले  

खुश रहे तू ... दुवा मांगने हम निकले
खुशी का रास्ता भुले, बदनसीब हम निकले

इश्क की आग मे खाक हो के हम निकले
राख से हो बेखबर तुम, बदनसीब हम निकले