Friday, 19 June 2020

परदा



होठों के कमलदल पे .... फैला है गुलाबी नशा
भंवरा पंखुडीयों की .... शराबी हंसी मे फसा

कांधे पे है जुल्फे ....
कुछ बिखरी सी....  कुछ उलझी सी
जुल्फो में अटकी जिंदगी ....
कुछ बिखरी सी....  कुछ उलझी सी

खुदाई का रास्ता ..... तेरी आंखो से होकार है जाता
आंखे न छिपाओ .... मेरे दर्द ए दिल का वास्ता

इक बार हटा के परदा .... आंखे तो मिला देना
इस भटके मुसाफिर का .... यही तो है ठिकाना

*शैलेन्द्र*
१७ जून, २०२०

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