Sunday, 12 February 2017

रात

क्यूँ मुसाफिर बन के रोज रात आती है।
जरा जरा सी ठहर के क्यूँ रात जाती है।।

दिन क्यूँ होते है .. लंबे लंबे .. साँस कहती है।
एक छोटेसे .. पल का कटना .. कितना मुश्किल है।
शाम की पहरेदारी .. सहना जादती .. हो जाती है।
जरा जरा सी ठहर के क्यूँ रात जाती है।।

चांद भी रूठके .. हर रोज .. तुकडा कम होता है।
एक दिन रूठके .. चेहरा भी .. छुपा देता है।
फिर कही एकही बार पूरी रात .. ठहर जाती है।
जरा जरा सी ठहर के क्यूँ रात जाती है।।

शिकायत भी करे .. तो भला .. किससे करे।
रुठ के और .. जल्दी जल्दी .. वो जाया न करे।
मिलन की प्यास भी .. अधुरीसी .. ही रह जाती है।
जरा जरा सी ठहर के क्यूँ रात जाती है।।



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